जीवन के उस मोड़ पर कुछ भी कहा जाता नहीं |

निर्देश: निम्नलिखित काव्यांश को पढ़कर दिए ए प्रश्नों (प्रश्न संo 91-96) के सही/सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनकर लिखिए |

जीवन के उस मोड़ पर
कुछ भी कहा जाता नहीं |
अधरों की ड्योढ़ी पर
शब्दों के पहरे है |
हंसने को हँसते हैं
जीने को जीते हैं
साधना-सुभितों में
ज्यादा ही रीति हैं |
बाहर से हरे-भरे
भीतर घाव मगर गहरे
सबके लिए गूंगे हैं-
अपने लिए बहरे हैं |

  1. “कुछ भी कहा जाता नहीं”- ऐसा क्यों?
    (a) साधन सुविधाओं के अभाव के कारण
    (b) बंधन और बेबसी के कारण
    (c) गूंगा होने के कारण
    (d) भीतर के घावों के कारण
  2. कविता के पंक्तियों में मुख्यत: बात की गई है
    (a) कुछ भी न कह पाने की विवशता की
    (b) घावों के हरे-भरे होने की
    (c) गूंगा-बहरा होने की
    (d) साधन-सुभीतों की
  3. ‘रीते’ शब्द में भाव है
    (a) अपनेपन का
    (b) परायेपन का
    (c) खालीपन का
    (d) खोखलेपन का
  4. कविता की पंक्तियों के आधार पर कहा जा सकता है कि
    (a) कवी कुछ भी कहने या सुन पाने की स्थिति में नहीं है
    (b) कवी घावों के गहरे होने से दुःखी है
    (c) कवी के जीवन में बहुत अभाव है
    (d) कवी कुछ भी करने की स्थिति में नहीं है
  5. ‘ड्योढ़ी’ का अर्थ है
    (a) घर
    (b) देहरी
    (c) दरवाज़ा
    (d) चौखट
  6. ‘भीतर के घाव’ से तात्पर्य है
    (a) शारीरिक क्षति
    (b) घर के भीतर की अशांति
    (c) ह्रदय की पीड़ा
    (d) अंदरूनी
Anurag Mishra Professor Asked on 27th February 2016 in Hindi.
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